तुम साथ खड़े होते हो। हर बार। तब भी जब इसकी कीमत चुकानी पड़े।
जब कुछ गड़बड़ होती है, तुम वो पहले इंसान हो जिसे लोग फ़ोन करते हैं — और तुम उठाते हो। तुम इसका तमाशा नहीं बनाते; बस पहुँच जाते हो। तुम्हें छोटी-छोटी बातें याद रहती हैं: मुश्किल बातचीत के बाद हाल पूछना, वो तारीख़ जिससे उन्हें डर लगता है, उस इंसान का नाम जिसने उन्हें चोट दी थी। आज के ज़माने में तुम्हारा इस तरह भरोसेमंद होना सच में बिरला है। जो तुम्हें बाकी सब भले लोगों से अलग करता है वो ये है: तुम्हें इसके लिए तारीफ़ नहीं चाहिए। तुम कोई हिसाब-किताब नहीं रख रहे, न किसी पहचान का इंतज़ार कर रहे हो। तुम साथ इसलिए खड़े होते हो क्योंकि इसका दूसरा रास्ता — कि तुम्हारा कोई अपना अकेले किसी मुश्किल से गुज़रे — तुम्हें बस मंज़ूर ही नहीं।
अपनी रीड पाओ — iPhone पर मुफ़्तकहने से पहले तुम पहुँच जाते हो। लोग एक बार आज़माते हैं — फिर आज़माना छोड़ देते हैं, क्योंकि जवाब उन्हें पता है।